समाधि-भावना – दिन रात मेरे स्वामी मैं भावना ये भाऊँ – कविश्री शिवराज


दिन-रात मेरे स्वामी, मैं भावना ये भाऊँ |
देहान्त के समय में, तुमको न भूल जाऊँ ||

शत्रु अगर कोई हो, संतुष्ट उनको कर दूँ |
समता का भाव धरकर, सबसे क्षमा कराऊँ ||

दिन-रात मेरे स्वामी, मैं भावना ये भाऊँ |
देहान्त के समय में, तुमको न भूल जाऊँ ||

त्यागूँ आहार-पानी, औषध-विचार अवसर |
टूटें नियम न कोई, दृढ़ता हृदय में लाऊँ ||

दिन-रात मेरे स्वामी, मैं भावना ये भाऊँ |
देहान्त के समय में, तुमको न भूल जाऊँ ||

जागें नहीं कषायें, नहिं वेदना सतावें |
तुमसे ही लौ लगी हो, दुर्या||न को भगाऊँ ||

दिन-रात मेरे स्वामी, मैं भावना ये भाऊँ |
देहान्त के समय में, तुमको न भूल जाऊँ ||

आतम-स्वरूप अथवा, आराधना विचारन |
अरहंत सिद्ध साधु, रटना यही लगाऊँ ||

दिन-रात मेरे स्वामी, मैं भावना ये भाऊँ |
देहान्त के समय में, तुमको न भूल जाऊँ ||

धरमात्मा निकट हों, चरचा धरम सुनावें |
वह सावधान रक्खें, गाफिल न होने पाऊँ ||

दिन-रात मेरे स्वामी, मैं भावना ये भाऊँ |
देहान्त के समय में, तुमको न भूल जाऊँ ||

जीने की हो न वाँछा, मरने की हो न इच्छा |
परिवार-मित्रजन से, मैं राग को हटाऊँ ||

दिन-रात मेरे स्वामी, मैं भावना ये भाऊँ |
देहान्त के समय में, तुमको न भूल जाऊँ ||

भोगे जो भोग पहिले, उनका न होवे सुमिरन |
मैं राज्य-संपदा या, पद-इन्द्र का न चाहूँ ||

दिन-रात मेरे स्वामी, मैं भावना ये भाऊँ |
देहान्त के समय में, तुमको न भूल जाऊँ ||

रत्न-त्रयों का पालन, हो अन्त में समाधी |
शिवराज प्रार्थना है, जीवन सफल बनाऊँ ||

दिन-रात मेरे स्वामी, मैं भावना ये भाऊँ |
देहान्त के समय में, तुमको न भूल जाऊँ ||

कविश्री शिवराज